Revisiting Nationalism in Contemporary   Milieu

24, अप्रैल 2020, National Webinar

Revisiting Nationalism In Contemporary Milieu’ विषय पर आयोजित सेमिनार में वक्ता के रूप में प्रोफेसर कट्टीमनी ने जनजातीय परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवाद को व्याख्यायित किया. अपने वक्तव्य में समकालीन परिवेश में राष्ट्रीयता पर पुनर्विचार करते हुए आपने कहा कि यदि राष्ट्रीयता पर कोरोनाकाल से पूर्व बात करते तो परिस्थितियां और संदर्भ आज से भिन्न होते. किसी को देखकर नमस्कार करने की हमारी संस्कृति है किंतु यदि कोरोना फैलने से पूर्व हम ऐसा करने को कहते तो लोग उसका उपहास उड़ाते लेकिन आज ब्रिटेन की महारानी और अमेरिका के राष्ट्रपति भी हाथ मिलाने के स्थान पर नमस्कार कर रहे हैं.
आगे आपने राष्ट्रीयता को परिभाषित करते हुए कहा कि राष्ट्रप्रेम ही राष्ट्रीयता है और यह मनसा, वाचा, कर्मणा होना चाहिए – ऐसा हमारे धर्म ग्रंथ कहते हैं. आगे आपने कहा कि हर व्यक्ति को अपना काम करना चाहिए इसके दो अर्थ हैं – अपना काम अपने लिए करो या अपना काम देश और समाज के लिए करो. इसी कड़ी में आपने कहा कि देश अपना होते हुए भी दूसरों का भी है कन्नड़ मेरी मातृभाषा है हिंदी मैंने सीखी है लेकिन मैं जितना प्रेम और सम्मान कन्नड़ का करता हूँ, उतना ही हिंदी का भी. रामेश्वरम और काशी हमारे देश में हमेशा जुड़े हुए हैं तमिल लोग काशी आते हैं तो हिंदी समझने की कोशिश करते हैं और काशी का व्यापारी तमिल में बात करता है. यह हमारे देश की परंपरा है कि हम एक दूसरे को समान मानते हैं और एक दूसरे को समझने एवं साथ लेकर चलने की कोशिश करते हैं.
आपने एक और प्रमुख मुद्दा उठाया कि यदि समाज के सभी लोगों की अनिवार्य आवश्यकताएँ – घर, कपड़ा, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि समान हैं तो कानून भी सभी भारतवासियों के लिए समान होना चाहिए. अलग-अलग कानून की धारणा ठीक नहीं है. एक देश एक कानून आवश्यक है.
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए आपने समाज में कानून के पालन पर जोर दिया और कहा कि समाज के आदरणीय एवं बौद्धिक लोगों की जिम्मेदारी है कि वे स्वयं कानून का पालन करें क्योंकि युवा पीढ़ी बातों को नहीं सुनती, आचरण को देखती है. अतः समाज हमसे यह अपेक्षा करता है कि हम केवल उपदेशक नहीं पालनकर्ता भी बनें.
आपने कहा कि फरवरी 2020 के बाद संपत्ति की परिभाषा बदल गई है. पहले सोना, जमीन, घर, मोटर, विमान आदि संपत्ति थे लेकिन आज स्वास्थ्य ही संपत्ति है. जिसकी रोग -रोधक क्षमता जितनी अच्छी है वह उतना ही अमीर है. अपने व्याख्यान के अगले चरण में आपने सरल और सात्विक जीवन पर जोर देते हुए इसे भारतीय परंपरा से जोड़कर यह कहा कि रामायण, महाभारत आदि सरल और सात्विक जीवन पर बल देते हैं इन ग्रंथों में सज्जन और सात्विक लोगों की संगति पर बहुत बल दिया गया है आज मानसिक शांति और सात्विक जीवन शैली मनुष्य की बहुत बड़ी संपत्ति हैं. आज अमीर वही है जो निरोग है, जिसके पास आनंद और शांति हैं. पहले हम जंगलों और होटलों में शांति ढूंढते थे. अब पता चला कि शांति अपने गरीबखाने में है. देश में 10 करोड़ जंगलवासी हैं. वे 3 महीने पहले जितने खुश थे, आज भी उतने ही हैं जबकि बाकी लोगों की स्थिति ऐसी नहीं है. हाशिए के लोगों की स्थिति कोरोनाकाल में मुख्यधारा के लोगों से बेहतर है. ऐसा क्यों है? इस पर हमें सोचना होगा.
दरअसल हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि तुम्हें जितना मिला है, उतने में खुश रहो. जितना चाहिए, उतना ही लो. इस देश के जंगलवासी, आदिवासी संग्रह कभी नहीं करते. असंग्रह उनका गुण है. जबकि आज का समय अधिक… और अधिक की नीति का अनुसरण करता है
आज हमारे पास दो रास्ते हैं – एक, स्वीकार कर लेना और दूसरा, छीन लेना(Accept and Grab). भारतीय संस्कृति की शब्दावली में छीन लेना नहीं है, स्वीकार कर लेना है. इतना ही नहीं हम तो आभार के साथ स्वीकार करने वाले लोग हैं. जंगलवासियों की शब्दावली में छीन कर लेना और संग्रह दोनों ही नहीं है, जो भारतीय संस्कृति की मूल शब्दावली में भी नहीं है. महाभारत में तो कहा गया है कि ब्राह्मण वह है जो संग्रह नहीं करता.
आपने एक और महत्वपूर्ण मुद्दे पर ध्यान आकर्षित कराते हुए कहा कि ‘शब्द आडंबर’ समझदारी का पर्याय नहीं है. ज्ञान परंपरा और ‘शब्द आडंबर’ दोनों पृथक हैं. आदिवासियों के पास ‘शब्द आडंबर’ नहीं है लेकिन भारत की अति महत्वपूर्ण प्राचीन ज्ञान परंपरा है. उपाधियों के बिना भी हम ज्ञानी हो सकते हैं बैगा वैद्य आदिवासी इसके अच्छे उदाहरण हैं.
आपने एक व्हाट्सएप मैसेज का जिक्र करते हुए कोरोना के बाद के बदलते सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक समीकरणों को उद्घाटित किया. आगे आप ने यह भी कहा कि भारत की श्रीमंत परंपरा महत्वपूर्ण है. आपने एक अति महत्वपूर्ण चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हमारे पास 130 करोड़ लोग हैं, पर इनमें कितने भारतीय हैं? इस पर हमें सोचना होगा. यदि हम सभी अपने देश – भारत और अपनी ज्ञान परंपरा पर विश्वास करते तो देश को आज इतना संघर्ष नहीं करना पड़ता. प्रधानमंत्री को इतनी चिंता नहीं करनी पड़ती. कोरोना वारियर्स के लिए जीवन-संघर्ष का प्रश्न नहीं खड़ा होता. पर आज भयावह स्थितियां हैं. इसका कारण यह है कि भारत में रहते हुए भी हमने भारत की असीम शक्ति पर भरोसा नहीं रखा. हमने हमेशा अपने ज्ञान को विदेशी मानकों पर परखने की कोशिश की. समय अभी शेष है… हमें प्रयास करना चाहिए कि हम अपनी ज्ञान परंपरा पर भरोसा पुनः स्थापित करें.

वक्तव्य – प्रोफेसर टी.वी.कट्टीमनी

रिपोर्ट
डॉ सत्य प्रकाश सिंह
सहायक प्रोफेसर , हिंदी विभाग , काशी हिंदू विश्वविद्यालय

Session : 11:00 AM TO 1:00 PM

Speakers:

1. Prof. Bhagwati Prakash Sharma, VC, Gautam Buddha University, Noida.
2. Prof. T.V.Kattimani, Former VC, IGNTU, Amarkantak.
3. Dr. Vivek K Nigam, Associate Professor(Economics)

Sangyartham Research Foundation is a non-profit institution founded by academicians, lawyers and professionals with an objective to promote original research on Indian thoughts and the issue flagged above, needs to be dealt with  appositely.  Thus, premised a discussion on “Revisiting Nationalism in Contemporary Milieu” is invited.

VC, Gautam Buddha University, Noida.

Prof. T.V.Kattimani

Former VC, IGNTU, Amarkantak.
 Associate Professor(Economics)

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