’आवां’ के निहितार्थ – जितेन्द्र श्रीवास्तव

चित्रा मुद्गल ने 25 अक्टूबर, 1964 (नवभारत टाइम्स, मुम्बई में प्रकाशित पहली कहानी – सफेद सेनारा) से अब तक लगभग पचपन वर्षों में जो सर्जनात्मक यात्रा की है, वह उल्लेखनीय तो है ही, विचारणीय भी है। वे सामाजिक गतिविधियों से गहरे जुड़ी रही हैं। वे एक एक्टिविस्ट लेखिका के रूप में जानी जाती हैं। अक्सर यह देखा जाता है कि अधिकतर एक्टिविस्ट किस्म का लेखन करने वालों के वहाँ विषय तो मस्तिष्क को छूने वाले आ जाते हैं लेकिन मन-मस्तिष्क दोनों को झकझोरने वाली गहराई नहीं आ पाती। इस दृष्टि से चित्रा जी के लेखन को देखें तो कह सकते हैं कि वे अपने एक्टिविज्म से खाद पानी ग्रहण करती रही हैं और अपने सर्जक से सृजन का जीवद्रव्य। वे एक्टिविज्म और अपनी रचना कीे प्राणवस्तु से जो रसायन बनाती हैं, वह एक सर्वथा नई चीज होती है। वहाँ नमक का स्वाद अलग और हल्दी का स्वाद अलग होने की जगह एक पूरी तरह तैयार स्वादिष्ट दाल का स्वाद है। यही वह कला है जो हर कवि-कथाकार कहलाने वाले व्यक्ति के पास नहीं होती है और जिसके पास होती है वह उल्लेखनीय और विचारणीय हो जाता है।
चित्रा मुद्गल जीवन और समाज की गझिन बुनावट को ठीक से समझती हैं, यह उनके लेखन से बार-बार प्रकट होता है। हाशिए के जीवन का व्याकरण जिस प्रकार उनके लेखन में आया है, वह प्रशंसनीय भी है और श्लाध्य भी। ’आवां’ का सृजन हाशिए के जीवन के व्याकरण की इसी समझ के कारण संभव हुआ है। यदि ऐसा न होता तो यह श्रमिक बस्तियों और उनके नेताओं के आपसी संघर्ष पर लिखा गया एक साधारण उपन्यास बन जाता। यहीं यह रेखांकन भी जरूरी है कि ’किसी भी जीवन का व्याकरण’ कोई सर्जक एक दिन में या दूसरों से बखान सुनकर आत्मसात नहीं कर सकता। जीवन का व्याकरण उधारी पर नहीं मिलता, उसे हासिल करना पड़ता है ’आवां’ जैसी कृति को पढ़ते हुए यह महसूस करना मुश्किल नहीं है कि चित्रा मुद्गल ने मुम्बई (तब के बम्बई) के श्रमिक जीवन में गहरे उतरकर उस जीवन का व्याकरण सीखा है। इस उपन्यास में यदि एक ओर उजली हँसी का छोर है तो दूसरी ओर बजबजाता नाबदान भी। लेखिका की विशेषता इसमें है कि वह किसी पक्ष को सघन और किसी पक्ष को विरल नहीं करती। पाठक जब इस उपन्यास में प्रवेश करता है तो वह इस बात से हतप्रभ रह जाता है कि यह लेखिका अपने पाठकों/पाठिकाओं को अलग से हतप्रभ करने की कोई कोशिश ही नहीं करती। वह उस विराट जीवन के समक्ष उसे खड़ा कर देती है जो हर चमत्कार का जन्मदाता है। यहाँ यह कहना आवश्यक है कि सर्जना में यह सहजता (जो स्वयं में एक चमत्कार है) हर सर्जक की हिस्से नहीं आती। साहित्य के एक विद्यार्थी के रूप में इन पंक्तियों के लेखक के लिए सहजता एक शिखर भारतीय जीवन मूल्य है। सहजता का सौन्दर्य चिरंजीवी होता है। ’आवां’ का महत्व उसकी संश्लिष्ट कथावस्तु के साथ ही उसकी रूपगत सहजता में भी है। 544 पृष्ठों का यह उपन्यास पाठक में कोई ऊब और खीझ पैदा नहीं करता। लेखकीय संवेदना की तरलता पाठक के मन और मानस को बाँधे रहती है। सन् 1999 का यह उपन्यास 2019 में मुझे किसी भी अर्थ में पुराना उपन्यास नहीं लगता। स्त्री जीवन के संदर्भ में तो बिल्कुल नहीं।
इस उपन्यास के आरंभ में लेखिका ने ’क्यों’ शीर्षक से एक आत्मवक्तव्य दिया है। इस वक्तव्य की रोशनी में यदि इस उपन्यास को पढ़ें तो निश्चय ही कई संदर्भों को समझने में सहायता मिलती है। 1964 के मुम्बई पूर्व की श्रमिक बस्तियों में गाँव-गिराँव की तरह ढिबरियाँ जलती थीं, बिजली के बल्ब नहीं, वहाँ शौचालयों की कोई व्यवस्था नहीं थी, स्त्रियों-पुरुषों को पास के जंगल में जाना पड़ता था- ये तथ्य मुम्बई (तब भी चमक रही थी) के सत्य के अलक्षित पक्षों से परिचित कराते हैं। जीवन बस किसी तरह चल रहा है। इन बस्तियों में रहने वाले लोग किसी भी अर्थ में नागर नहीं हैं। उपन्यास में चित्रा जी ने सत्य के इस पक्ष को उद्घाटित करने के लिए कई प्राणवान दृश्यों का सृजन किया है।
भूखे मजदूरों के आक्रोश को वाणी देने के लिए, उन्हें शब्दबद्ध करने के लिए जिस कलात्मक अनुशासन की आवश्यकता होती है, वह इस उपन्यास में है। उपन्यास की कथा कहीं से भी बिखरती नहीं है। कथा के तंतु एक दूसरे से गहरे सम्बद्ध हैं। चित्रा मुद्गल 1964 में मीरा ताई और दत्ता सामंत से जुड़ीं। यह जुड़ाव लम्बा नहीं रहा लेकिन चित्रा जी के मानस के निर्माण में यह संक्षिप्त अवधि निर्णायक रही। श्रमिकों के जिस जीवन और सत्ता संघर्ष से वे उस अवधि में परिचित हुईं, वह उनके भीतर उमड़ता-घुमड़ता और पकता रहा। वह खूब पका और लगभग साढ़े तीन दशक बाद ’आवाँ’ के आकार में ’सर्जक के आवां’ से प्रसूत हुआ। उपन्यास की नायिका नमिता पाण्डे अपने साधारण रूप- रंग में असाधारण यथार्थ का रंग-रूप लिए पाठकों के संसार में उपस्थित होती है। बेहद स्वाभिमानी नमिता वंचना के कूड़ाघर पर अपने सपनों का शीशमहल बनाती है लेकिन श्रमिक स्वप्नों और ईमान के बीच पली वह पतनशील पूंजीवादी जीवन मूल्यों को अपनी आत्मा का मुकुट नहीं बनाती। अपनी इच्छाओं से हार जाती है। यह कहें कि इच्छाओं का चरित्र बदल देती है अंतत्तः! लौट आती है अपने पुराने संसार में, अपने मन जैसा जीवन जीने की उम्मीद में। हालांकि यह भी एक संभावना है बस। पितृसत्तात्मक संरचना किसी स्त्री को उसके मन जैसा जीवन जीने देगी यह एक रूमानी ख्याल है, लेकिन अच्छा है क्योंकि इसमें संघर्ष की इच्छा शामिल है।
नमिता इस उपन्यास की नायिका है। वही आँख है इस उपन्यास की। उपन्यास का आरंभ भी नमिता से है और अंत भी। बीच में नमिता की कथा है और श्रमिक जीवन एवं उच्चवर्गीय जीवन की कुछ उपकथाएँ हैं। कथा-उपकथा के बीच नमिता सेतु है। वह एक पूर्व मजदूर नेता की बेटी है। वह मजदूर नेता तब के सबसे प्रभावशाली मजदूर नेता अन्ना साहेब (जिसको दत्ता सामंत के व्यक्तित्व के आधार पर गढ़ा गया है) का दायाँ हाथ रह चुका है। गोली लगने और फालिज मारने के बाद वह अपनी खोली में बिस्तर पर पड़ा रहता है। पत्नी उससे बहुत मतलब नहीं रखती। बेटी ही उसका पूरा ध्यान रखती है। पिता कई बार संकोच में आता है, उसकी आँख में आँसू भी आते हैं लेकिन दोनों के पास कोई विकल्प नहीं है। पिता की एक अवैध संतान (जिसका पता बाद में चलता है) भी है लेकिन इस एक बात के अलावा पिता रौशन ख्याल है। वह बेटी की अग्रगामिता से प्रसन्न भी होता है। एक प्रसंग में वह स्लेट पर लिखता है (क्योंकि बोल नहीं सकता फालिज के कारण)- ’मुझे खुशी है कि तुमने पहली बार अपने विषय में स्वतंत्र निर्णय लिया। विवेक जाग्रत है तुम्हारा, जाग्रत ही रखना। मैं तुमसे हरगिज नहीं पूछूंगा कि तुम वहां नौकरी क्यों नहीं करना चाहतीं? निश्चित होकर सो जाओ- नए भोर की प्रतीक्षा में, जिसे कोई सूर्य नहीं, स्वयं आदमी गढ़ता है……।’1 (आवां पृ. 143, संस्करण)
यह प्रसंग उस समय का है जब वह कामगार अघाड़ी की नौकरी छोड़ने का निर्णय लेती है। वह पिता को बता नहीं पाती कि उसने नौकरी अन्ना साहेब की वजह से छोड़ी है। देवता जैसी छवि वाले अन्ना इतने कामातुर हैं कि मित्र की बेटी से भी अमर्यादित आचरण करते हैं। वह ’बेटी जैसी’ और ’बेटी’ का अंतर सामने रखते हुए अपने को सही साबित करने की कोशिश करते हैं। चित्रा मुद्गल ने इस प्रसंग को उपन्यास में क्यों शामिल किया होगा? कोई कह सकता है कि इस प्रसंग के बिना भी उपन्यास आगे बढ़ सकता था लेकिन चित्रा जी ने इस प्रसंग को जोड़ा तो कोई कारण तो होगा। इन पंक्तियों के लेखक को लगता है कि इस प्रसंग के सृजन के पीछे पितृसत्तात्मक संरचना के मूल आचरण को अभिव्यक्त करने की मंशा है। यह प्रसंग उस विडम्बना को हमारे सामने लाता है जिसमें मुक्ति के अगुवा समझे जाने वाले लोग भी स्त्री को प्रथमतः और अंततः देह ही मानते हैं। यह एक अकेला प्रसंग लौह व्यक्तित्व वाले अन्ना साहेब के भीतरी लिजलिजेपन को प्रभावी ढंग से उभार देता है। इस प्रसंग के अतिरिक्त पवार के मित्रों की स्त्री सम्बन्धी (नमिता समेत) टिप्पणियाँ ये बताती हैं कि मुक्ति की तमाम लड़ाइयाँ अंततः पुरूषों के अपने लाभ-लोभ की लड़ाइयाँ हैं जो पितृसत्ता के शामियाने के नीचे ही लड़ी जाती हैं। कभी-कभी स्त्रियों को भ्रम होता है कि इन लड़ाइयों में उनकी भी भागीदारी है और इस तथ्य की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता कि पितृृसत्ता मंद-मंद मुस्कुराते हुए इस विभ्रम को बनाए रखना चाहती है। यहीं उपन्यास के बिल्कुल आरंभ का यह दृश्य भी देखा जाना चाहिए- ’भीड़ से उसकी मुलाकात जब भी होती, उसके धड़ से उसे सिर गायब मिलता और उसके संभलते, न संभलते वह धड़ अचानक कोंचती कुहनियों, सरसराती उंगलियों, लोलुप कनखियों, सिसकारी भरती छुअन में तब्दील हो अपने करीब दबोचते-चांपते संभोग को उद्दीप्त होने लगता। मुक्ति की छटपटाहट उसकी थर्राती रंध्रों से रिसती परनालों-सी उफनने लगती और वह पाती कि उसके देह पर चढ़े कपड़े अचानक देह की चमड़ी हो गए हैं….।’2 (आवां, पृ.13,संस्करण)
यह मुम्बई की लोकल ट्रेन का यथार्थ है। 1964 का भी और आज का भी। यहाँ इस बात का उल्लेख जरूरी है कि बिना कोई अतिरिक्त तेवर दिखाए चित्रा मुद्गल अपने इस उपन्यास में निम्नवर्गीय स्त्री जीवन को बहुत हद तक पूर्णता में दिखा पाई हैं। इस उपन्यास में निम्नवर्गीय स्त्री जीवन की क्षुद्रताएं हैं तो औदात्य भी। कई बारीक चीजें भी चित्रा जी ने पकड़ी हैं।
नमिता पाण्डेय के चरित्र का जो ग्राफ है, उसे व्याख्यायित करने से पहले सुनंदा के चरित्र पर बात जरूरी है। सुनन्दा, नमिता के पिता की ही जैविक संतान है। सुनंदा की माँ (किशोरी बाई) से नमिता के पिता का कोई प्रेम प्रसंग था, इसका कोई खुलासा उपन्यास में नहीं है लेकिन किशोरी बाई जब नमिता से उसके पिता के विषय में बात करती है तो उसमें आदर मिश्रित अनुराग की गूँज सुनी या अनुमानित की जा सकती है। सुनंदा नमिता से अधिक तेजस्वी है। वह एक मुसलमान से प्रेम करती है। बिना विवाह माँ बनती है लेकिन ’प्रेम’ और ’विवाह’ के बीच आई शर्त को अस्वीकार कर देती है। वह धर्म बदलकर विवाह करने से इंकार कर देती है। उसका प्रेमी सुहैल देश छोड़कर दुबई भाग जाता है। प्रेम में पुरुषों की कायरता छिपाए नहीं छिपती। वह दिख ही जाती है। वह पानी पर तेल की तरह ऊपर आ जाती है। स्त्रियाँ मिट जाती हैं, पुरुष भाग जाते हैं। ’गोदान’ में प्रेमचंद ने भी इसे रेखांकित किया था। सुनंदा ने जिस पुरुष को प्रेम किया, भारतीय समाज में बिन ब्याही जिसके बच्चे की माँ बनी, वह वासना का पुँज धर्म की रजाई में मुँह फेरकर सो गया।
सुनंदा ठीक सोचती है कि जब प्रेम करते वक्त, एक दूसरे में प्रवेश करते वक्त धर्म कहीं नहीं था फिर विवाह के वक्त वह केन्द्रीय कैसे हो सकता है! चित्रा जी ने इस प्रश्न को ठीक से उठाया है। सत्ता के खेल में शामिल लोग इस प्रसंग को साम्प्रदायिक रंग दे देते हैं और अपने आचरण से सही अर्थों में एक मुक्त स्त्री का स्वरूप रचने वाली सुनंदा की हत्या कर दी जाती है। रात के अंधेरे में छिपकर। कायर हत्यारे एक तेजस्वी स्त्री का सामना दिन के उजाले में नहीं कर सकते। उन्हें तो सिर्फ अंधेरा अच्छा लगता है। वह विचारों का हो या प्रकृति का। वे उसी में सुरक्षित हैं। यदि चरित्रों पर विचार करना हो तो यह कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि सुनंदा इस उपन्यास की सर्वाधिक अर्थपूर्ण चरित्र है। उसका और उसकी माँ का चरित्र इस उपन्यास को आकाशधर्मी बनाते हैं। उसकी मृत्यु वह बिन्दु है जहाँ नमिता अंतिम रूप से उस दुनिया को छोड़ने का निर्णय लेती है। श्मशान भूमि से बाहर निकलते हुए उसके और युवा मजदूर नेता पवार के बीच जो संवाद हैं, वे उपन्यास और नमिता को समझने में मददगार है – ’कोई उम्मीद कहीं हुई नौकरी की?’
एक पारंपरिक आभूषण-निर्यातक हैं- बाबा ज्वेलर्स परसों बुलाया है उन्होंने। बायोडेटा दे आई हूं। देखो क्या होता है? अनिश्चितता की तकलीफ छिपी नहीं रह पाई मेरे स्वर में।
नहीं हुआ, तब?
रोजगार कार्यालय वालों ने भी आश्वासन दिया है।
फिलहाल क्या कर रही?
श्रमजीवा में पापड़ बेल रही हूँ। साड़ियों में फाल लगा रही हूं।
आज तुम्हारा मन नहीं किया कि तुम आघाड़ी लौट आओ और सुनंदा की जगाई हुई अलख प्रज्वलित करो? पवार ने मुझे टोहना चाहा।
किया मगर मैं ऐसा करूंगी नहीं। स्पष्ट मन की सुनिश्चितता स्वीकारी मैंने।
क्यों? मन में चेतना जगी है तो उसका जबरन निषेध क्यों?
कारण न पूछो तो अच्छा है। शायद तुम्हारे जान लेने के लिए इतना ही काफी है कि मुझमें ऐसी कोई चिनगारी नहीं, जो लपट होने के लिए कोई भी कीमत अदा करने को तत्पर हो उठे। सुनंदा की मौत ने हिला दिया। सुनंदा की मौत ने मेरे निर्णय को और पुख्ता कर दिया। इन अराजब गलियों में मैं सांसें नहीं भर सकती। मैं अपने लिए एक नई दुनिया के द्वार खोलना चाहती हूँ। अभावों की बिलबिलाहट से दूर- छद्म हत्याओं और भीतरघातों से परे।
तुम्हें क्या लगता है, व्यवस्था बदले बिना तुम्हारी कोई नई दुनिया अस्तित्व पा सकती है।’ 3 (आवां पृ.155.156, संस्करण)

नमिता, पवार के प्रश्न का जवाब नहीं देती। उस समय उसके पास कोई जवाब था भी नहीं लेकिन उपन्यास का अंत पवार के प्रश्न का उत्तर है। नमिता चमक-दमक की दुनिया से लौट आती है लेकिन वह अपने घर नहीं जाती। किशोरी बाई के घर जाने का निर्णय करती है, जहाँ सुनंदा की अबोध बेटी भी है। किशोरी बाई की चाली अब उसका नया पता है। यह समय के आवां में पकी नई नमिता है। यह उपन्यास रेखांकित करता है कि स्त्रियों के जीवन में सिर्फ कोई एक आवां नहीं होता, कोई एक अकेली अग्नि परीक्षा नहीं होती।
यहाँ उपन्यास से दो उद्धरण देकर आगे बढ़ना उचित लग रहा है। ये दोनों प्रसंग सुनंदा की हत्या के तुरंत बात के हैं। सुनदंा के वहां मातमपुर्सी के लिए गई नमिता, अन्ना साहेब का जो चरित्र वहाँ देखती है, उसके बाद सोचती है। इस सोचने में प्रश्नाकुलता है लेकिन विवेक जाग्रत है। वह सोच रही है- ’कामगार आघाड़ी का कार्यालय छोड़ने के पश्चात हम मिल भी रहे थे तो कैसी जटिल परिस्थितियों में! जहां राग-विराग, घृणा, ईष्र्या, द्वेष, तिरोहित हो, शून्य हो उठा।
पहली बार, हर्षा, इस द्वंद ने संदेह दबोचा कि क्या व्यक्ति की जिंदगी में अनायास उपजे कमजोर क्षण या दमित कामनाएं उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का पर्याय है? क्या उनके विषय में उदार होकर सोचने की जरूरत है? टूट गए कांटे की फांस की टीस विस्मृत न हो तो? अन्ना साहब कोई पहली बार तो केबिन में अकेले नहीं हुए होंगे और भविष्य में होंगे भी नहीं, कोई सुनिश्चितता थी? बल्कि खतरनाक बात यह थी कि अपने कृत्य के विषय में उनके मन में कतई निषेध-भाव नहीं था।’ 4 (आवां पृ.153, संस्करण)
इस तरह का एक प्रश्न उसके मन में किशोरी बाई के संदर्भ में पिता के लिए भी उठ चुका है। दूसरा उद्धरण विमला बेन ( मीरा ताई के व्यक्तित्व के आधार पर सृजित चरित्र) का प्रत्युत्तर है। वे जब लपककर सुनंदा के शव को कंधा देने लगती हैं तो पाटिल उन्हें ससंकोच बरजता है। पूरा प्रसंग इस प्रकार है- ’बाई साहब! ये आप क्या कर रहीं? आपको मालूम नहीं, औरत के लिए मय्यत को कंधा देना शास्त्र सम्मत नहीं? प्रत्युत्तर में विमला बेन चोट खाई शेरनी-सी दहाड़ीं। कूपमंडूक पुरुषों से हमें सीखना होगा कि स़्ित्रयों के लिए क्या शास्त्र सम्मत है, क्या नहीं? निर्दोष स्त्री की नृशंस हत्या करना शास्त्र-सम्मत है, पाटिल? नहीं, तो पूछो अपने हृदय से कि क्यों हम में से किसी ने उसके प्राण ले लिए? मैं कंधा किसी औरत की मय्यत को नहीं दे रही, उस स्त्री-चेतना को दे रही हूँ जिसका गला घोंटने की कोशिश हत्या के बहाने हुई है! मैं हर जाति, धर्म, वर्ण की स्त्रियों का आवाहन करती हूं कि सबकी सब श्मशान चलें और बारी-बारी से सुनंदा की मय्यत को कंधा दें।’ 5 (आवां पृ. 153, संस्करण)
परिणाम ढेर सारी स्त्रियाँ शव को कंधा देने आ र्गइं। सन् 1964-65 में यह एक नई बात थी। लेखिका ने इसे प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है। उन्होंने पूरे प्रकरण के राजनीतिक निहितार्थों की ओर भी इशारा किया है।
यह उपन्यास श्रमिक संगठनों और आन्दोलनों को ईमानदारी से सामने रखता है। दत्ता सामंत की ताकत और कमजोरियों (जिनमें चरित्र भी शामिल है) को अन्ना साहेब के माध्यम से चित्रित किया गया है। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भी अलग-अलग प्रसंगों के माध्यम से चित्रित वर्णित किया गया है। मीरा बेन (उपन्यास में विमला बेन) और दत्ता सामंत की हत्याएं मुक्ति प्रसंगों का विलोम रचती हैं लेकिन लेखिका ने निभ्र्रांत ढंग से श्रमिक मुक्ति आंदोलनों की भीतरी कलह (जो अदहन की तरह खौलती रहती है) को रेखांकित किया है। वेश्या जीवन के मार्मिक प्रसंग भी इस उपन्यास को अर्थपूर्ण और स्मरणीय बनाते हैं। पवार का चरित्र पाठकों में रूचि पैदा करता है। वह एक संभावनापूर्ण चरित्र है। उसकी महत्वकांक्षा उसे कब तक ईमानदार रहने देगी, यह एक ऐसा प्रश्न है जो पाठक के दिमाग में घूमता रहता है।
’आवां’ में एक संसार श्रमिकों का है तो दूसरा संसार उच्चमध्यवर्गीय लोगों का है। अंजना वासवानी और संजय जैसों का संसार। इस संसार में भावनाओं के लिए कोई अवकाश नहीं है। ’अपना सुख’ ही ’पृथ्वी का सुख’ है – यही इस वर्ग का जीवन-दर्शन है। नमिता का अबाॅर्शन हो जाने के बाद संजय जिस भाषा में उससे बात करता है, वह मनुष्य होने की गरिमा के विरूद्ध है। नमिता, संजय को प्रेम करने लगी है लेकिन संजय को अपने और अपनी पत्नी के लिए बच्चा चाहिए। संजय की पत्नी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि उसका पति एक दूसरी स्त्री के साथ सम्बन्ध में है। चित्रा मुद्गल बिना किसी अतिरिक्त प्रेम या पूर्वाग्रह के प्रत्येक वर्ग का सत्य उद्घाटित करती हंै। यहाँ यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि यह उपन्यास शिवसेना के उद्भव और श्रमिक आंदोलन में उसके प्रवेश को भी विश्वसनीय ढंग से सामने लाता है। इस उपन्यास का महत्व इस बात में है कि यह मुम्बई के श्रमिक आन्दोलन के उत्थान और पतन की विश्वसनीय गाथा है। नमिता का लौटना किसी थके मुसाफिर का लौटना नहीं है। उसका लौटना निरुद्देश्य हो रहे जीवन से सोदे्देश्य जीवन की ओर लौटना है। इस लौटने में मनुष्य होने की गरिमा है। अपने ’स्व’ का ’अन्य’ में विलय करने की आकांक्षा है। यह एक स्त्री के आत्मबल का जीवंत रेखांकन है। नमिता के इस चरित्र में एक संकेत है कि जो टूटकर फिर खड़ा होता/होती है, उसे तोड़ना शायद संभव नहीं होता।
इस उपन्यास को पढ़ते हुए यह याद रखना आवश्यक है कि नमिता की माँ, उसकी कुंती मौसी और श्रमिक बस्ती की सैकड़ों स्त्रियाँ इस महान देश की आधी आबादी के वृहत्तर सत्य को अंशतः ही सही लेकिन प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। कपड़ों का रफू होना तो हम सबने देखा है लेकिन जीवन को कैसे रफू किया जाता है, यह देखना हो तो इस उपन्यास को पढ़ना चाहिए। ’आवां’ का एक महत्व यह भी है कि इसमें लेखिका ने उजालों के पीछे के स्याह अंधेरों को बहुत प्रभावी ढंग से पाठकों की आँखों के सामने ला खड़ा किया है। इसके लिए वे जिस भाषा का प्रयोग करती हैं, उस पर भी बातचीत जरूरी है।
हमारे साहित्य संसार में एक वर्ग ऐसा है जो जलेबीनुमा भाषा को नवोन्मेष मानता है लेकिन दूसरा वर्ग भी है जो सादगी के सौन्दर्यशास्त्र पर फ़िदा है। चित्रा मुद्गल इस दूसरे वर्ग में आती हैं। उन्होंने इस तथाकथित भाषिक नवोन्मेष के समानांतर हिंदी गद्य की जातीय स्मृतियों को बचाते हुए उसे पुनर्नवा किया है। नया मन, नया गद्य लेकिन स्मृतिहीन नहीं। पानीदार गद्य इसे ही कहते हैं। वही लेखक सही अर्थों में बड़ा होता है जिसकी भाषा की आँखों में पानी हो। जहाँ तक बीस वर्ष बाद फिर से ’आवां’ को पढ़ने का प्रश्न है तो इस संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि ’आवां’ अभी दहक रहा है।

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